चेनाब नदी के किनारे एक खूबसूरत जगह है- तख़्त हजारा। यहाँ बहने वाले दरिया की लहरें और बगीचे की खुशबू की वजह से इसे पूरब का स्वर्ग कहा जाता है। यही रांझाओं की धरती है जो मस्ती से यहाँ रहते हैं। इस बस्ती के नौजवान खूबसूरत और बेपरवाह किस्म के हैं। वे कानों में बालियाँ पहनते हैं और कंधे पर नए शॉल रखते हैं। उनको अपनी खूबसूरती पर गर्व है और सभी इसमें एक-दूसरे को मात देते दिखते हैं। इसी बस्ती का मुखिया था जमींदार मौजू चौधरी। वह आठ बेटे और दो बेटियों का बाप था। वह बहुत धनी और खुशहाल था और कुनबे में सभी उसका सम्मान करते थे। सभी बेटों में वह रांझा को सबसे ज़्यादा प्यार करता था। इस कारण रांझा के बाकी भाई उससे बहुत जलते थे। बाप के डर से वे रांझा पर सीधे वार नहीं कर पाते थे लेकिन पीछे ताना मारते रहते थे जिससे रांझा केदिल को ऐसे चोट लगती थी जैसे सोये हुए आदमी को अंधेरे में सांप डंक मारता हो। फिर एक अंधेरी रात ऐसी भी आई जब रांझा पर कयामत का कहर बरपा। उस रात उसका बाप मौजू चल बसा। रांझा के भाइयों और भौजाइयों ने उसपर अब खुलेआम बार-बार ताना कसना शुरू कर दिया। वे रांझा को कहते, "आलसी बैठकर रोटी तोड़ता है और दो आदमी के बराबर दूध पी जाता है, वो भी मक्खन मार के।" भाइयों ने रांझा से छुटकारा पाने के लिए षडयंत्र करना शुरू कर दिया और एक योजना बनाई रांझा के सभी भाई मिलकर जमीन की माप-जोख करनेवाले काज़ी के पास गए और उसे रिश्वत देकर अच्छी जमीनों को आपस में बाँट लिया। बंजर और बेकार जमीन रांझे के हिस्से में आई। यह सब देखकर रांझा के दुश्मनों की खुशी का तो ठिकाना नहीं था। अब वे समाज में घूम-घूम कर कहने लगे कि अब रांझा को भाइयों ने जाल में अच्छा फांसा है। रांझा को भी वो अपमानित करते हुए कहते थे, “यह आदमी खेत कैसे जोत सकता है जिसके सर पर बड़े-बड़े बाल हैं लेकिन दिमाग में दही भरा है। ऐसे आदमी से कौन औरत शादी करेगी जो जिंदगी में कभी कुछ नहीं कर सकता।" रांझा की बेइज्जती करने में भाई भी पीछे नहीं थे, वे कहते, "उसने तो औरतों की तरह चूड़ियाँ पहन रखी हैं। दिन भर बाँसुरी बजाता रहता है और रात भर गाता रहता है। अगर वह जमीन को लेकर लड़ने आता है तो आने दो। देखते हैं कि क्या कर लेता है? हम सब की ताकत के आगे वह अकेला कुछ नहीं कर सकता।" रांझा भारी दिल लिए अपने बैलों को लेकर खेत जोतने चला लेकिन उसकी आत्मा रो रही थी और धूप की तल्ख़ी उसके दुख को और बढ़ा रही थी। खेत जोतते हुए जब थक गया तो वह छाया में जाकर लेट गया और आराम करने लगा। उसकी भौजाई साहिबा उसके लिए खाना लेकर आई और वह अपना दर्द उससे कहने लगा, "भौजी, मुझे खेत जोतना अच्छा नहीं लग रहा। जमीन बहुत कठोर है। मेरे हाथों में फफोले और पैरों में छाले पड़ गए हैं। पिताजी जिंदा थे तो कितने अच्छे दिन थे। जाने वे कहाँ चले गए और ये बुरे दिन मुझे देखने पड़ रहे हैं।" साहिबा ताना मारते हुए बोली, “वैसे तुम तो बस अपने पिता के ही दुलारे थे। माँ के लिए तुम शर्मसार करने वाले बेटे थे | साहिबा की बात सुनकर रांझा को बहुत गुस्सा आया और उसने जवाब दिया,"सही कहा गया है कि औरत दगाबाज़ होती है। तुम औरतों ने समस्या खड़ी की और मुझे मेरे भाइयों से अलग करवा दिया। मैं एक खुश जिंदगी जी रहा था लेकिन तुम्हारी बुरी जुबान के कारण घर में झगड़े शुरू हुए। तुम औरतें मर्दो को उकसाती हो ताकि एक-दूसरे से लड़ पड़ें।" साहिबा ने उतनी ही तल्ख़ी से उलटकर कहा, "तुम बहुत ज़्यादा दूध और चावल खा रहे हो, इसलिए इतना घमंड दिखा रहे हो। एक तुम ही हो जो हमारे परिवार पर कलंक हो। अगर घर छोड़ दो और कुछ दिन भूखा मरना पड़े तो तुम्हारी ये सारी भाषणबाज़ी बंद हो जाएगी। तुम आलसी हो और किसी काम के नहीं हो। तुम गाँव की लड़कियों पर बुरी नज़र रखते हो। गाँव की औरतें हमें खुलेआम कहती हैं कि वे तुम्हारे प्यार में पड़ गई हैं। तुम्हारी खूबसूरती देख ये औरतें उसी तरह फंसती हैं जैसे कि मधु में मक्खियाँ चिपक जाती हैं। औरतें तुम्हारे पीछे दिन-रात भागती हैं। तुम्हारे प्यार ने जाने कितने घरों को बर्बाद कर  दिया है।" भौजाई की जली-कटी सुनने के बाद रांझा और भी गुस्से में आया और जवाब दिया, “सारी दुनिया जानती है कि तुम इस गाँव की सबसे झगड़ालू औरत हो और तुम इतनी खूबसूरत हो कि तुम्हारे पति को इस बात का कभी डर नहीं होगा कि कोई दूसरा आदमी तुमको भगा ले जाएगा।" क्रोध से साहिबा की आँखे लाल हो गई और उसकी सूरत पर लहराती लटें जहरीले साँप की फन की तरह हो गए। वह बोलने लगी, "अगर हमलोग तुम्हारे लिए इतने ही बुरे हैं तो जाओ किसी सियाल की लड़की से शादी कर लो। जाओ उनके घरों के आस-पास जाकर __ अपनी बाँसुरी बजाओ और उनकी औरतों को फाँस लो। अगर तुमको हमारी खूबसूरती पसंद नहीं तो जाओ हीर से शादी कर लो। उसे दिन-रात तलाश करो ताकि तुम उसे अपने जाल में फँसा सको। अगर दिन में वह हाथ न आए तो रात को घर की पिछली दीवार गिराकर उसे भगा ले जाओ। साहिबा की बातों का जवाब देने में रांझा भी पीछे नहीं हटा। कहने लगा, “तुम्हारे जैसी भौजाई को तो नदी में डूबो देना चाहिए। मैं हीर को ब्याह कर लाऊँगा और तुम्हारे जैसी औरतें उसकी नौकरानी बनेंगी।" और यह कहने के बाद रांझा मुँह घुमाकर बैठ गया, साहिबा उसका कांधा देखती हुई बोली, "तुमको अब जल्दी से जल्दी शादी कर ही लेनी चाहिए नहीं तो हीर की खूबसूरती मुरझा गई तो बहुत देर हो जाएगी।' इस झगड़े के बाद रांझा अपनी बाँसुरी को लेकर पिता का घर छोड़कर जाने लगा। अब वह तख़्त हजारा का पानी तक नहीं पीना चाहता था। गाँव का एक चरवाहा दौड़ा-दौड़ा रांझा के भाइयों के पास गया और उनको इस बारे में बताया। रांझा का अपनी भाइयों और भौजाइयों से फिर सामना हुआ। रांझा के भाई कहने लगे, 'रांझा, क्या हो गया। हमारी पत्नियाँ तुम्हारे लिए नौकरानी की तरह काम करती हैं और हम लोग तुम्हारे गुलाम हैं। क्यूँ घर छोड़कर जा रहे हो?" भौजाइयाँ कहने लगीं, “हम खून के आँसू रोते हैं जब तुम हमें कड़वी बातें कहते हो। हमने तुम्हारे लिए क्या नहीं किया। अपनी जिंदगी, संपत्ति...सब कुछ तो तुम पर न्योछावर कर दिया।" रांझा ने भौजाइयों को जवाब दिया, "मैं घर छोड़ने का मन बना चुका हूँ तो तुम लोग मुझे अपने इरादे से भटकाने की कोशिश क्यों कर रहे हो? बहुत दिनों से मुझे तख़्त हजारा के दाना-पानी से नफ़रत सी हो रही है। पहले तुम लोगों की जली-कटी सुनकर मेरा दिल जला। उसके बाद तुम सबने मुझे मेरे भाइयों से अलग करवा दिया और अब अपना असली रंग बदलकर मीठी-मीठी बातें कर रही हो। तुम सब । अपने इरादों में सफल नहीं हो सकती। मैं तय कर चुका हूँ कि मुझे पिता का घर छोड़कर जाना है।"  दूर चलने के बाद रांझा एक मस्जिद के पास पहुँचा जो मक्का और यरूशलम के मस्जिद जैसा ही खूबसूरत था। भूख और ठंड के मारे उसका बुरा हाल था और वह बहुत थका हुआ था। उसने अपनी बाँसुरी निकाली और बजाने लगा। उसके संगीत से आसपास जादू सा होने लगा। कुछ लोग सुनकर अपना होश खो बैठे और कुछ उसकी तरफ खिंचे चले आए। पूरा गाँव उसके आसपास जुट गया। अंत में मुल्ला आया जो झगड़ालू किस्म का था। रांझा को देखते ही वह कहने लगा,

"लंबे बालों वाला यह काफिर कौन है? यहाँ ठगों के रहने के लिए जगह नहीं है। अपने बाल पहले कटवाओ ताकि तुम ख़ुदाई जगह पर रूकने के काबिल हो सको।" रांझा ने मुल्ला को जवाब दिया, "लंबी दाढ़ी से तो तुम शेख की तरह लगते हो फिर भी शैतान की तरह व्यवहार क्यों कर रहे हो? मेरे जैसे बेकुसूर यात्रियों और गरीब फकीरों को दूर क्यों भगाते हो? तुम कुरान अपने सामने रखते हो फिर भी तुम्हारे मन में इतना भेदभाव भरा है। तुम गाँव की महिलाओं को गलत राह दिखाते हो; तुम तो गायों के बीच में साँढ जैसे हो।” मुल्ला ने पलटकर जवाब दिया, "मस्जिद ख़ुदा का घर है और तुम्हारे जैसे शैतान को इसमें रहने का कोई हक नहीं है। तुम नमाज अता नहीं करते, लंबे बाल और मूंछे रखते हो। ऐसे आदमी को तो हम पीट कर भगाते हैं। कुत्तों और तुम्हारे जैसे भीखमंगों को तो चाबुक से मारा जाना चाहिए।" रांझा ने मुल्ला से कहा, "ख़ुदा तुम्हारे गुनाहों को माफ करे। ऐ अक्लमंद इंसान, ये बताओ कि शुद्ध क्या है और अशुद्ध क्या? गलत क्या है और सही क्या? नमाज किन चीजों से बनता है, यह कैसे अता किया जाता है और यह किसके लिए शुरू हुआ था?" मुल्ला ने तीखे तेवर के साथ जताया कि वह मज़हब के सिद्धांतों से अच्छी तरह वाकिफ है। उसने कहा कि नमाज़ उनके लिए है जिनको खुदा पर यकीन हो और यह पाक रूहों को मुक्ति की ओर ले जाता है। लेकिन, मुल्ला ने कहा, "रांझा जैसे अनैतिक आदमी को ईमानदारों के समूह से अपमानित कर बाहर निकाला जाना चाहिए।" मुल्ला की नैतिकता पर भाषण और चालाकी भरी ये बातें सुनते ही रांझा जोर-जोर से हँसने लगा। उसको हँसते देख आसपास खड़े लोग चकित रह गए और हो सकता है कि उनमें से कुछ खुश भी हुए हों। गुस्से से मुल्ला लाल हो गया। उसने रांझा से कहा, "खुदा को याद करो। मैं आज की रात तुमको मस्जिद में गुजारने की छूट देता हूँ लकिन ऐ मूर्ख जाट तुम सबेरे अपना सर ढंक कर यहाँ से निकलोगे या मैं चार आदमियों को बुलाकर धक्के मारकर तुमको बाहर करूँगा।" रांझा उस रात को मस्जिद में सोया और सुबह की पहली किरण के साथ ही आगे यात्रा करने के लिए निकल पड़ा। उस समय चिड़िया चहचहा रही थी, किसान अपने बैलों को लेकर खेतों की तरफ निकल रहे थे और लड़कियाँ दूध के बर्तन धोने की तैयारी में | लगी थी। घर की महिलाएं अनाज कूटने में लग गई थी और उनकी आवाज सुनाई दे रही थी। दिन में तीसरे पहर जब सूरज पश्चिम दिशा में ढलने के लिए चल पड़ा, उस समय रांझा चेनाब नदी के किनारे खड़ा था। वहां कई और यात्री जमा थे जो नदी पार करवाने वाले मांझी लुड्डन का इंतजार कर रहे थे। रांझा ने मांझी से कहा, ऐ दोस्त, खुदा के लिए मुझे नदी पार करा दो।' लुड्डन मांझी अपने तोंद पर हाथ फेरता हुआ हंसने लगा और उसका मजाक उड़ाते हुए बोला, 'खुदा का प्यार हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता। हम तो पैसे के लिए नदी में नाव चलाते रांझा उससे गुजारिश करते हुए बोला,'मैं एक जरूरी यात्रा पर निकला हूँ और मंजिल तक पहुंचना बहुत जरूरी है। मैं तुम्हारे नाव की पतवार चलाऊँगा, मुझे ले चलो।' मांझी ने जवाब दिया, ‘अपने खुदा से कहो कि वह तुम्हारे पैसे चुका दे। जो पैसे देता है बस उन्हीं को  मैं उस पार ले जाता हूँ चाहे वह चोर हो या डाकू। लेकिन भिखारियों, फकीरों और जो बैठे-बैठे कुत्तों की तरह रोटी तोड़ते हैं, उनको भगा देता हूँ। जो जबरदस्ती नाव पर चढ़ने की कोशिश करता है, उसे हम नदी में फेंक देते हैं चाहे वह पीर का बेटा वारिस ही क्यों न हो। बिना कुछ लिए हम नदी पार नहीं कराते।' आखिरकार रांझा मांझी की बातों को सुनकर परेशान हो गया और कोने में जाकर बैठ गया। उसने अपनी बांसुरी निकाली और महबूब से जुदाई के गीत का धुन बजाने लगा। उसकी आँखों के किनारे से आंसुओं के गर्म झरने गिर रहे थे और लग रहा था कि दुर्भाग्य ने उसे घेर लिया है। बांसुरी की विरह राग सुनकर सभी मर्द और औरत नाव से उतरकर रांझे के आसपास बैठ गए। लुड्डन की दो बीवियां रांझे के पांवों को दबाकर सेवा करने लगी। मांझी लुडुन यह सब देखकर गुस्से से लाल हो गया और बोलने लगा, 'यह युवक कोई जादूगर है। इसने तो मेरी बीवियों को अपने वश में कर लिया है।हमें इस जाट के जाल से बचाओ. यह हमारी औरतों को भटकाकर ले जाएगा।  रांझा की बांसुरी ने ऐसा जादू किया था कि लोगों ने लुड्डन की बात पर ध्यान ही नहीं दिया। बांसुरी बजाते-बजाते जब रांझा के दिल को थोड़ी राहत मिलने लगी तो उसने आस-पास घेरे लोगों को नजरअंदाज करते हुए अपना जूता उठाया और नदी के पानी में उतरने लगा।

उसे ऐसा करते देख लोग कहने लगे, 'नहीं, नहीं, नदी में मत उतरो। चेनाब की धार गहरी और बहुत तेज है। इसकी गहराई को कोई नहीं माप सका। एक क्षण में यह नदी जान ले सकती है।'
लुड्डन की बीवियों ने रांझा के कपड़े का छोड़ पकड़ लिया और उसे लौटने को कहने लगी। लेकिन रांझा ने सबसे कहा, 'जिसकी जिंदगी कष्ट में हो, वह मर जाए, यही सही होगा। वे खुशनसीब हैं जिनसे उनका घर-बार नहीं छूटता। मेरे मां-बाप नहीं रहे तो भाइयों ने मुझे दुख देकर घर से निकाल दिया।'
रांझा ने अपने कपड़ों को सर पर रख लिया और अपनी आत्मा को मजबूत करते हुए नदियों के खुदा का नाम लिया और पानी में चलने लगा।
लोग उसकी तरफ दौड़े और उसे पकड़ कर वापस ले आए। लोग उसे जोर-जोर से कहने लगे, 'भाई, मत जाओ, निश्चित रूप से तुम नदी में डूब जा हम तुमको अपने कांधों पर ले चलेंगे। हम सब तुम्हारे सेवक हैं और तुम हम सबके प्यारे हो।' रांझा के बांहों को उन लोगों ने पकड़ा और खींच कर नाव पर लाया। नाव पर लाकर रांझा को सबने हीर की गद्दी पर बिठा दी। रांझा गद्दी की खूबसूरती देखकर इसके बारे में पूछने लगा तो लोगों ने बताया कि यह एक बेहद खूबसूरत लड़की इस पर बैठती है। वह मीर चूचक की बेटी है। माहताब से भी ज्यादा चमकता हुस्न है उसका। उसके हुस्न के कयामत से परियों की रानी तक खौफ खाती हैं। एक बार जो उसके जादू में गिरफ्तार हुआ, वह धरती पर आवारा हो गया। वह सियालों के लिए गर्व करने की चीज है। उसका नाम हीर है। रांझा ने बिना किसी भेदभाव के, बड़े-छोटे, अमीर-गरीब; सबसे उस गद्दी पर बैठने की गुजारिश की। वे सब रांझा के आस-पास उसी तरह बैठ गए जैसे कि शम्मे को चारों तरफ से परवाने घेर लेते हैं। अब लुड्डन रांझा को उस पार न ले जाने की बात को यादकर पछता कर रहा था। वह कहने लगा, 'मुझे । डर लगने लगा था कि कहीं यह डाकू बांसुरी के जादूसे मेरी बीवी को लूटकर न ले जाए।' नाव पर लोग रांझा से उसकी जिंदगी के बारे में पूछने लगे। कहां से आए हो? घर क्यों छोड़ दिया? तुम तो बड़े कमजोर दिख रहे हो, क्या किसी ने तुमको कुछ खाने-पीने को नहीं दिया? रांझा ने सबको अपनी पूरी कहानी सुनाई और कहा, _ 'मैं अपने मां-बाप का दुलारा था लेकिन खुदा को यही मंजूर था जो अब मेरे साथ हो रहा है।' नाव के उस पार जाने के बाद लोग गांवों में रांझा का किस्सा सुनाने लगे। उसके बांसुरी के जादू के बारे में सबको बताने लगे। वे कहते,'जब वह बोलता है तो उसकी जुबां से फूल झड़ते हैं। लुड्डन की बीवियां तो उससे प्यार करने लगी और वह हीर की गद्दी पर बैठा।' हीर जितनी खूबसूरत थी, उसकी सखियां उतनी ही हसीन थीं। दुनिया में शायद ही कोई नस्ल होगी जो खूबसूरती में सियालों के कुनबे की इन हसीनाओं का मुकाबला कर सकती थी। हीर को अपने हुस्न पर बड़ा नाज़ था। उसके कानों में मोतियों से बने झुमके चमक रहे थे। हीर का हुस्न अपने आप में कयामत की तरह था। उसको देखते ही लोग जमीं और जन्नत को भूल जाते थे। ओ कवि, तुम कैसे हीर के हुस्न का बखान करोगे? मुहब्बत से भरी उसकी आंखें जूही के फूल सी नर्म दिखती थी। उसके गाल गुलाब की पंखुरियों से कोमल थे। उसके होठों की लाली देखकर लोग खुदा, खुदा करके रोने लगते थे। हीर और सखियां नदी में नहाने आईं। वे सब उस नाव के पास आईं तो सबने देखा कि हीर की गद्दी पर कोई मासूम सा युवक लाल शॉल ओढ़े सोया है। हीर की नजर जैसे ही रांझे पर गई वह गुस्से से लाल  हो गई। उसने क्रोध में आकर लुडुन स कहा, 'लुड्डन, बदमाश! मेरी गद्दी का अपमान करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुमने किसको उस पर सुलाया है? क्या तुम मेरी इज्जत नहीं करते या खुदा के डर से तुमने ऐसा किया है?' लुड्डुन हाथ जोड़कर कहने लगा,'मुझे माफ करो, मैं बेकसूर हूं। मैंने इस लड़के को यहां सोने के लिए नहीं कहा। यह बिन बुलाए मेहमान की तरह यहां आया। इसके बांसुरी की धुन ने हम सब के दिल पर जादू कर दिया। अपने हुस्न पर इतना गुमां न करो, शहजादी। अपने सेवकों पर जुल्म तो न करो। तानाशाह भी खुदा से डरते हैं।' हीर का गुस्सा कम नहीं हुआ। उसने जवाब दिया,'इस लड़के को कोई परवाह नहीं कि इसने कितना बड़ा गुनाह किया है। क्या यह नहीं जानता यह फिलहाल वहां है जहां मेरे पिता चूचक का साम्राज्य है? मैं किसी की परवाह नहीं करती चाहे वह शेर हो या हाथी या फिर किसी सामंत का बेटा। यह है कौन? मेरे पास तो इसके जैसे हजारों गुलाम हैं और ऐसे लोगों की मैं कोई परवाह नहीं करती।' को खरी-खोटी सुनाने के बाद हीर रांझा की तरफ मुड़ी। वह गुस्से में जोर से बोली, 'ऐ सोनेवाले, मेरे बिस्तर से उठ जाओ। कौन हो तुम और सोने के लिए तुमको मेरा ही बिस्तर मिला? मैं दिनभर सखियों के साथ यहां खड़ी देख रही हूं। मुझे बताओ कि तुम घोड़े बेचकर क्यों सो रहे हो? क्या तुम्हारे बुरे दिन आ गए हैं जो तुम चाबुक खाने के लिए यह खतरा उठा रहे हो? क्या तुमको रातभर नींद नहीं आई जो तुम खर्राटे मार रहे हो? या तुम ये सोचकर बेपरवाह होकर इस बिस्तर पर सो गए जैसे कि दुनिया में इसका कोई मालिक ही न हो? हीर के इतना चिल्लाने के बावजूद जब रांझा की नींद नहीं खुली तो उसने अपनी सेविकाओं को उसे जबर्दस्ती उठाने को कहा। हुस्न की शहजादी हीर का गुस्सा बेकाबू हो चुका था। तभी रांझा ने अपनी आंखे खोली और उठकर कहने  लगा, 'मेरे साथ नजाकत से पेश आओ, ऐ खूबसूरत शहजादी' रांझा के बोल सुन हीर का गुस्सा उसी तरह पिघल गया मानो कश्मीर के बर्फ पर जेठ की जलती धूप पड़ गई हो। रांझा की एक बांह में बांसुरी लटकी थी और कानों में उसने कुंडल पहन रखे थे। रांझा का सौंदर्य उस वक्त पूनम के चांद की तरह चमक रहा था। हीर और रांझा की आंखें चार हुईं और मुहब्बत के मैदान में एक दूसरे से टकराने लगीं। हीर का दिल खुशियों के सागर में गोते खाने लगा। हीर रांझा से सटकर उसी तरह जा बैठी जैसे कि तरकश में तीर पनाह लेती है। दोनों एक दूसरे से प्यार से बातें करने लगे। मुहब्बत वहां मैदान मार ले गई। हीर को अपने दिल पर वश न रहा जैसे वह अपने होशोहवास खो बैठी थी। वह अपने हुस्न पर नाज करना भूलकर राँझा पे अपना सब कुछ वारने को तैयार हो गई हीर राँझा से कहने लगी मैंने न तो तुम्हे पीटा और ना ही कुछ ऐसा कहा जो तुमको बुरा लगे  राँझा ने जवाब दिया यह दुनिया एक सपने की तरह है ए खुद पर नाज पर करने वाली शहजादी तुमको भी एक दिन यहाँ से जाना है तुमको किसी  अजनबी से ऐसा सुलूक नहीं करना चाहिए |किसी गरीब को नहीं दुत्कारना चाहिए | ए लो तुम्हारा बिस्तर और गद्दा मै जा रहा हु  फिर कभी नहीं दिखूंगा | राँझा ने इतना कहा ही था की हीर बोल पड़ी अब ए हीर तुम्हारी है | मै अपनों के बीच भटक रही थी लेकिन मुझे कोई रास्ता दिखने वाला अब तक नहीं मिला |लेकिन अब खुदा ने तुमको मेरे लिए भेज दिया है